हरतालिका तीज व्रत कथा: माता पार्वती की तपस्या से शिव-पार्वती विवाह तक की पौराणिक गाथा
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर अपने गणों के साथ विराजमान थे। माता पार्वती ने folded hands के साथ उनसे प्रश्न किया कि उन्हें इतने महान पति के रूप में शिव कैसे प्राप्त हुए। तब भगवान शंकर ने उत्तर दिया कि यह सब उनकी पूर्व जन्मों की तपस्या और पुण्य फल का परिणाम है। उन्होंने बताया कि भाद्रपद शुक्ल तृतीया का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है और जब यह हस्त नक्षत्र में पड़ता है, तब इसका फल और भी महान हो जाता है।
माता पार्वती ने उत्सुक होकर पूछा कि उन्होंने यह व्रत कब और कैसे किया था। तब भगवान शंकर ने पूरी कथा सुनाई। पार्वती का जन्म राजा हिमाचल और रानी मैना के घर हुआ था। बचपन से ही उनका मन भगवान शिव की आराधना में लग गया। उन्होंने सहेली के साथ मिलकर हिमालय की गुफाओं में कठोर तपस्या शुरू कर दी। चाहे ग्रीष्म हो, वर्षा हो या शीत—उन्होंने तपस्या नहीं छोड़ी। वे केवल पत्तों का सेवन करतीं और धीरे-धीरे उनका शरीर बहुत क्षीण हो गया। राजा हिमाचल को उनकी चिंता होने लगी।
इसी बीच नारद जी हिमाचल के पास आए और बताया कि भगवान विष्णु पार्वती से विवाह करना चाहते हैं। यह सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न हो गए, परंतु पार्वती अत्यंत दुखी हो गईं। उन्होंने रोते हुए अपनी सहेली से कहा कि वे विष्णु से विवाह नहीं करना चाहतीं, केवल शिव को ही पति रूप में चाहती हैं। तब सहेली ने उन्हें एक गुप्त गुफा में छिपा दिया ताकि पिता उन्हें ढूंढ न सकें। पार्वती वहीं रहकर बिना अन्न-जल के कठोर तप करने लगीं। उन्होंने नदी की रेत से शिवलिंग बनाया और पुष्पों से पूजा की। यह वही दिन था—भाद्र मास की शुक्ल तृतीया, जो हस्त नक्षत्र में पड़ी थी।
पार्वती की तपस्या से भगवान शिव का हृदय पिघल गया। वे उनके सामने प्रकट हुए और बोले कि वे उनकी आराधना से अत्यंत प्रसन्न हैं, इसलिए उनसे वर मांग सकती हैं। माता पार्वती ने लज्जा के साथ प्रार्थना की कि वे उन्हें पति रूप में स्वीकार करें। तब शिवजी ने "एवमस्तु" कहकर वरदान दे दिया और अदृश्य हो गए। इसके बाद पार्वती मूर्ति विसर्जन करने नदी किनारे गईं, तभी नगरवासी और उनके पिता हिमाचल उन्हें ढूंढते हुए वहाँ पहुँच गए। जब राजा ने उन्हें घर चलने को कहा तो पार्वती ने साफ कह दिया कि यदि विवाह होगा तो केवल शिव से ही होगा, अन्यथा वे आजीवन कुंवारी रहेंगी।
अंततः राजा हिमाचल ने उनकी इच्छा का सम्मान किया और भगवान शिव को दामाद रूप में स्वीकार कर लिया। उसी के बाद विधिपूर्वक माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह सम्पन्न हुआ। तभी से यह व्रत "हरतालिका तीज" कहलाने लगा। "हरतालिका" नाम इसलिए पड़ा क्योंकि पार्वती की सहेली (तालिका) ने उन्हें पिता से "हर" (अर्थात छिपाकर) जंगल में ले जाकर कठोर तप करने में मदद की थी। इस व्रत का महत्व यह है कि इसके पालन से अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और जीवन में संकल्पों की पूर्ति होती है।
हरितालिका तीज 2025 पूजा का समय
-
तिथि: 28 अगस्त 2025
-
व्रत प्रारंभ: सुबह 6:30 बजे से
-
पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 6:45 बजे से रात 8:30 बजे तक
-
व्रत समाप्ति: अगले दिन सूर्योदय के बाद
इस दौरान महिलाएं शिव-पार्वती की मूर्ति को शृंगार करती हैं, व्रत कथा सुनती हैं और रात भर जागरण करती हैं।
तीज का शृंगार
हरितालिका तीज पर महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं, हाथों-पैरों में मेहंदी रचाती हैं और गहनों से सजती हैं।
-
पारंपरिक मेहंदी डिज़ाइन जैसे बेल-बूटे, मोर और मंडला पैटर्न सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं।
-
आधुनिक डिज़ाइनों में अरेबिक स्टाइल और फ्लोरल पैटर्न भी पसंद किए जा रहे हैं।
-
तीज पर मेहंदी का विशेष महत्व है, इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
हरितालिका तीज की विशेषताएं
-
सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं।
-
अविवाहित लड़कियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।
-
पूजा के बाद हरितालिका तीज की शुभकामनाएं (Teej Wishes) देना भी परंपरा का हिस्सा है।
मेहंदी डिज़ाइन









